“तेल, सत्ता और थिंक-टैंक: क्या भारत की विदेश नीति कॉरपोरेट के हाथों में?”
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
“तेल, सत्ता और थिंक-टैंक: क्या भारत की विदेश नीति कॉरपोरेट के हाथों में?”दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था के समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन एक स्थायी सत्य यह है कि सत्ता और पूँजी का गहरा रिश्ता होता है। भारत की मौजूदा स्थिति इसका जीता-जागता उदाहरण है। हालिया घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की संसद, विदेश नीति और यहाँ तक कि रक्षा रणनीति तक कॉरपोरेट हितों की गिरफ्त में हैं।
अंबानी का तेल साम्राज्य
2011 के बाद से भारत की नीतियों में जो बदलाव आये, उनमें अंबानी समूह की भूमिका निर्विवाद रूप से दिखती है। ऑयल फील्ड्स बिल पास करवा कर बड़े उद्योगपतियों को "ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस" का रास्ता मिला। नतीजा यह हुआ कि रूसी तेल के सौदों से अंबानी ने अरबों डॉलर का मुनाफा कमाया। जनता को आज भी 110 रुपए लीटर पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, जबकि कॉरपोरेट घराने 16 बिलियन डॉलर तक का फायदा बटोर चुके हैं।
ORF: थिंक-टैंक या कॉरपोरेट लॉबी?
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की कहानी सत्ता और पूँजी की सांठगांठ का प्रतीक है। पहले एक "स्वतंत्र" थिंक-टैंक के रूप में शुरू हुआ यह संगठन अब 65% फंडिंग अंबानी से पाता है। रायसीना डायलॉग जैसे आयोजनों में विदेश मंत्रालय तक की भागीदारी इसका प्रमाण है कि यह संस्थान सिर्फ विचार विमर्श का मंच नहीं बल्कि विदेश नीति को दिशा देने वाला एक छद्म कॉरपोरेट उपकरण बन चुका है। और तो और, इसका वॉशिंगटन चैप्टर विदेश मंत्री के बेटे के नेतृत्व में है।
रूस-चीन समीकरण और अमेरिकी असंतोष
रूस से सस्ता तेल खरीदने और उसे यूरोप में बेचकर जो अरबों का मुनाफा हुआ, उसने अमेरिका की नाराज़गी बढ़ाई। अमेरिकी वित्त मंत्री का हालिया बयान इस गठजोड़ को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करता है। सवाल यह उठता है कि क्या भारत की विदेश नीति "राष्ट्रीय हित" से प्रेरित है या "कॉरपोरेट लाभ" से?
अदानी का नया दांव
जैसे अंबानी ने ORF खड़ा किया, वैसे ही अदानी ने चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) की नींव रख दी है। इसमें नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत जैसे नाम शामिल कर इसे वैधता देने की कोशिश हो रही है। संकेत साफ हैं—आने वाले वर्षों में संसद और नीतिगत ढाँचे पर अदानी का प्रभाव और मजबूत होगा।
सत्ता की चौथी असफलता
सवाल यह है कि क्या एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की विदेश और रक्षा नीति का नियंत्रण उन कंपनियों के हाथों में होना चाहिए जिन्हें सिर्फ मुनाफे से मतलब है? सरकार का यह रवैया लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से विमुख होकर सीधे-सीधे "कॉरपोरेट राज" की ओर ले जा रहा है।
जनता के लिए संदेश
भारत की जनता को यह समझना होगा कि पेट्रोल पंप पर हर लीटर पेट्रोल में सिर्फ टैक्स या अंतरराष्ट्रीय बाजार का असर नहीं, बल्कि कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का गहरा खेल है। आज आवाज़ न उठी तो आने वाले समय में नीति, सुरक्षा और लोकतंत्र—सभी सिर्फ मुनाफे के पैमाने पर नापे जाएंगे।
निष्कर्षतः यह समय केवल सवाल पूछने का नहीं बल्कि जवाब मांगने का है।
क्या हम ऐसी सत्ता चाहते हैं जो जनता के बजाय कॉरपोरेट की कठपुतली बने? यदि नहीं, तो अब लोकतंत्र की असली ताकत—जनमत और विरोध—को सामने लाना ही होगा।