फासिस्ट राजनीति, विपक्ष की कमजोरी और मीडिया का अपराध
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
फासिस्ट राजनीति, विपक्ष की कमजोरी और मीडिया का अपराध❝मुल्क का मुस्तक़बिल किस ओर जाएगा, यह आज भी धुंधला है। लेकिन वक़्त की पुकार साफ़ है—सिर्फ़ खड़ा होना नहीं, बल्कि सोचना, सवाल करना और सत्ता से जवाब माँगना भी उतना ही ज़रूरी है।❞
भारत का लोकतंत्र आज जिस दोराहे पर खड़ा है, वहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लोकतंत्र की आत्मा—संविधान और संस्थाएँ—क्या अब भी जनता के लिए काम कर रही हैं या सत्ता के पिंजरे में कैद हो चुकी हैं। पिछले तीन दशकों में फासिस्ट राजनीति की जो तेज़ी देखने को मिली, उसमें बेरोज़गारी, महंगाई, जाति-मज़हब की खेमेबंदी और महामारी जैसे राष्ट्रीय संकट भी किसी प्रकार का अवरोध नहीं बन सके। बल्कि, सत्ता ने इन्हीं संकटों को अपने फायदे का साधन बना लिया।
👉 संसाधनों और संस्थाओं पर क़ब्ज़ा
आज फासिस्ट ताक़तें सिर्फ़ संसद तक सीमित नहीं हैं; उन्होंने न्यायपालिका, जाँच एजेंसियों, विश्वविद्यालयों और यहाँ तक कि चौथे स्तंभ मीडिया पर भी गहरी पकड़ बना ली है।
संविधान की धारा 19(1)(a) हर नागरिक को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है, और मीडिया को इसका वाहक माना गया था। लेकिन व्यवहार में मीडिया अब इस धारा का अपमान कर रहा है। सत्ता की आलोचना करने के बजाय मीडिया "मोदी का मास्टरस्ट्रोक" और "ऐतिहासिक उपलब्धि" जैसी शब्दावली रचकर सत्ता की जनविरोधी नीतियों को जनसमर्थन का आवरण देता है।
👉 विपक्ष की सीमाएँ
विपक्ष, लोकतंत्र की आत्मा का दूसरा पहरेदार होता है। लेकिन भारत का संसदीय विपक्ष इस फासिस्ट रफ़्तार को रोकने में नाकाम साबित हुआ है। संसदीय राजनीति की सीमाएँ यहाँ खुलकर सामने आती हैं।
राहुल गांधी द्वारा उठाया गया "वोट चोरी" का मुद्दा जनता के भीतर हलचल पैदा करता है, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित है कि क्या यह महज़ चुनावी सुधार तक सीमित है या किसी ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम का हिस्सा भी है?
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यही सवाल लगभग दस वर्ष पूर्व हैदराबाद में भी उठा था, लेकिन तब मीडिया और राजनीतिक प्रतिष्ठान दोनों ने इसे दबा दिया। आज यदि यह चर्चा ज़िंदा है, तो इसका श्रेय जनता और सोशल मीडिया को है, जिसने गोदी मीडिया की सेंसरशिप तोड़ दी।
👉 मीडिया की ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान अपराध
भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को "लोकतंत्र का चौथा स्तंभ" कहा गया था। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के Norms of Journalistic Conduct (पत्रकारिता आचारसंहिता) साफ़ कहती है कि पत्रकारिता का दायित्व है—जनता को तथ्यात्मक और निष्पक्ष सूचना देना।
लेकिन आज मुख्यधारा मीडिया ने अपनी स्वतंत्रता सत्ता के हाथ गिरवी रख दी है। सत्ता के घोटालों पर चुप्पी और जनआंदोलनों को बदनाम करने की मुहिम—यह दोनों ही मीडिया की नैतिक विफलता और लोकतांत्रिक अपराध हैं।
👉 समानांतर सियासत और जनता की निराशा
आज एक तरफ़ सत्ता है, जिसने संस्थाओं पर कब्ज़ा कर लिया है और देश को भीतर-बाहर से कमजोर कर रही है। दूसरी तरफ़ विपक्ष है, जो "वोट चोरी" जैसे मुद्दों पर बहस तो करता है लेकिन बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक नफ़रत और आर्थिक असमानता पर ठोस खाका प्रस्तुत करने में विफल है।
सचाई यह भी है कि आर्थिक और विकास नीतियों में सत्ता और विपक्ष के बीच बहुत गहरा अंतर नहीं है। यही वजह है कि जनता में राजनीतिक मोहभंग और गहरी निराशा बढ़ रही है।
👉 जनता के प्रश्न ही लोकतंत्र का भविष्य हैं;
भारत के लोकतंत्र का भविष्य आज धुंधला है। लेकिन एक बात साफ़ है—
संविधान की रक्षा सिर्फ़ संसद में नहीं, जनता की सड़कों पर भी होगी।
मीडिया का अपराध उतना ही बड़ा है जितना सत्ता का दमन।
विपक्ष की कमजोरी का समाधान जनता की जागरूकता और प्रश्न पूछने की क्षमता है।
"लोकतंत्र की ताक़त वही है जहाँ जनता सवाल करना नहीं छोड़ती। आज सबसे बड़ा काम यही है—सोचना, सवाल करना और सत्ता से जवाब माँगना। क्योंकि यही संविधान की आत्मा है।"