अमेरिका-भारत ट्रेड वॉर: चौथा बड़ा झटका
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अमेरिका-भारत ट्रेड वॉर: चौथा बड़ा झटका
भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर वैश्विक आंधी में फँस गई है। ट्रंप सरकार द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50% तक टैरिफ़ बढ़ाना केवल व्यापारिक मसला नहीं है, बल्कि यह रोज़गार, उद्योग और भारत की विदेश नीति की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
1. कारोबार पर सीधी चोट
टेक्सटाइल, ज्वैलरी, ऑटो पार्ट्स और केमिकल्स जैसे सेक्टर—जो अब तक अमेरिकी मार्केट में भारतीय ताक़त माने जाते थे—महंगे हो जाने से प्रतिस्पर्धा खो देंगे। निर्यात सिकुड़ेगा, कारोबारियों की कमाई घटेगी और पूँजी निवेश ठप पड़ने लगेगा।
2. नौकरियों पर मंडराता संकट
भारत का MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ही रोज़गार की रीढ़ है। निर्यात घटा तो कारख़ानों में उत्पादन घटेगा, ऑर्डर कम होंगे और सबसे पहले छोटे उद्योग पस्त होंगे। परिणाम साफ़ है—नए रोजगार बंद, पुरानी नौकरियां कटौती की भेंट चढ़ेंगी और लाखों परिवार असुरक्षा की मार झेलेंगे।
3. अर्थव्यवस्था पर असर
भारत की जीडीपी और चालू खाता संतुलन में निर्यात का महत्वपूर्ण योगदान है। लगातार टैरिफ़ बाधाओं ने रुपया कमजोर करने और चालू खाता घाटा बढ़ाने का ख़तरा पैदा कर दिया है। एक तरफ़ विकास की गति थम सकती है, दूसरी तरफ़ महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
4. विदेश नीति पर सवाल
भारत-अमेरिका राजनीतिक रिश्ते मज़बूत दिखते हैं, लेकिन व्यापारिक वार्ताओं में भारत बार-बार पिछड़ता रहा है। सवाल उठता है कि क्या हमारी कूटनीति ने आने वाले संकट का अनुमान नहीं लगाया? क्या मजबूत राजनीतिक मंचों के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर तैयारी अधूरी रही?
नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना के बाद अब यह चौथा बड़ा झटका है जिसने भारतीय उद्योग-व्यापार को वेंटिलेटर पर डाल दिया है। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि लाखों रोज़गार और करोड़ों परिवारों के भविष्य का सवाल है। सरकार को तात्कालिक राहत (ब्याज, सब्सिडी, एमएसएमई पैकेज) के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी—क्योंकि ट्रेड वॉर में भावनाएँ नहीं, ठोस आर्थिक तैयारी ही हथियार साबित होती है।