ड्रैगन और हाथी का नृत्य: भारत-अफ्रीका संबंधों के नए आयाम

 

.ड्रैगन और हाथी का नृत्य: भारत-अफ्रीका संबंधों के नए आयाम

वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत और अफ्रीका के बीच एक नई साझेदारी आकार ले रही है। लगभग $83 बिलियन के मौजूदा व्यापार के साथ, दोनों का लक्ष्य 2030 तक इसे दोगुना कर $164 बिलियन तक पहुंचाना है। यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य न केवल दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक तालमेल को दर्शाता है, बल्कि यह भी इंगित करता है कि अभी भी अपार संभावनाएं हैं जिन्हें भुनाया जाना बाकी है। विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से गुजर रही हैं, यह साझेदारी भारत और अफ्रीका दोनों के लिए एक टिकाऊ और पारस्परिक रूप से लाभकारी भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

ऑटोमोबाइल क्षेत्र: अवसरों का महाद्वीप

भारत और अफ्रीका के बीच सहयोग के कई क्षेत्र हैं, जैसे कृषि, स्वास्थ्य, और डिजिटल तकनीक, लेकिन ऑटोमोबाइल उद्योग एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सबसे अधिक संभावनाएं छिपी हैं। अफ्रीका सालाना लगभग $20 बिलियन के वाहनों का आयात करता है, जबकि भारत का योगदान इसमें केवल $2 बिलियन है। यह एक बड़ा अंतर है जो भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए एक विशाल और अछूते बाजार को उजागर करता है।

भारत की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री, जो हाल ही में घरेलू बाजार में चुनौतियों का सामना कर रही है, के लिए अफ्रीका एक महत्वपूर्ण समाधान हो सकता है। ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, FY25 में यात्री वाहन उद्योग में 1-4% की मामूली वृद्धि का अनुमान है। घरेलू बाजार में मांग की सुस्ती, डीलरों के पास 55 दिनों तक का स्टॉक (आदर्श 21 दिन) और $51,000 करोड़ से अधिक की इन्वेंट्री वैल्यू ने कंपनियों पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसे में निर्यात से मिली 9% की वृद्धि एक उम्मीद की किरण है, और अफ्रीका उस उम्मीद को एक बड़ा अवसर बना सकता है।

अफ्रीका में 'मेड इन इंडिया': एक रणनीतिक बदलाव

अफ्रीका की तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण और सड़कों की स्थिति को देखते हुए, भारतीय कंपनियों के लिए कम लागत वाले, टिकाऊ, और रखरखाव में आसान वाहन बनाने की आवश्यकता है। यह भारतीय कंपनियों की विशेषता है। चीन की BYD और Chery जैसी कंपनियां पहले ही इस बाजार में अपनी पैठ बना रही हैं, लेकिन भारत अपनी लागत-प्रभावी इंजीनियरिंग, और मज़बूत वाहनों के साथ उन्हें कड़ी टक्कर दे सकता है।

केवल निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय, भारतीय कंपनियों को अफ्रीका में स्थानीय असेम्बली प्लांट और साझेदारियाँ स्थापित करने पर ध्यान देना चाहिए। "मेक इन अफ्रीका विद इंडिया" जैसी पहल, जिसके तहत भारत सरकार कौशल विकास और तकनीकी सहायता प्रदान करे, अफ्रीकी देशों को भी आकर्षित करेगी। यह न केवल आयात शुल्क (जो 25-40% तक हो सकता है) को कम करेगा, बल्कि स्थानीय रोजगार सृजन में भी मदद करेगा। 

सरकारी पहल और कूटनीतिक सहयोग की आवश्यकता

भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को अफ्रीका में सफल होने के लिए सिर्फ निजी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं; सरकार की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।

1. उत्पादन प्रोत्साहन योजनाएँ (PLI): सरकार को PLI जैसी योजनाओं के तहत अफ्रीका में निर्यात और स्थानीय असेम्बली को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए।

2. मुक्त व्यापार समझौता (FTA): अफ्रीकी देशों के साथ FTA या विशेष टैरिफ रियायतों पर बातचीत करके भारतीय वाहनों को प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।

3. लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत सरकार को शिपिंग, लॉजिस्टिक्स, और अफ्रीकी बंदरगाहों पर विशेष 'इंडिया ऑटो हब' बनाने में निवेश करना चाहिए ताकि आपूर्ति श्रृंखला सुगम हो सके।

4. संगठित मंच: NASSCOM ने जिस तरह भारतीय आईटी उद्योग को एक वैश्विक ब्रांड बनाया, उसी तर्ज पर सरकार India Auto Global Council (IAGC) जैसी एक संस्था स्थापित कर सकती है। IAGC ऑटोमोबाइल कंपनियों, पुर्ज़ा निर्माताओं, और सरकार को एक मंच पर लाएगी, जिससे भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को संगठित रूप से वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया जा सके।

एक साझा भविष्य

यह साझेदारी केवल आर्थिक लाभों तक सीमित नहीं है। भारत अपनी डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI), सस्ती दवाइयों और टीकों के माध्यम से अफ्रीका को तकनीकी और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी मदद कर सकता है। संयुक्त रूप से, भारत और अफ्रीका जैसे बड़े जनसांख्यिकीय शक्ति वाले देश WTO जैसे वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज को और प्रभावी बना सकते हैं।

निष्कर्षतः यह साझेदारी भारत को अपने घरेलू बाजार की चुनौतियों से उबरने और वैश्विक ऑटोमोबाइल मानचित्र पर अपनी स्थिति मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करती है। वहीं, अफ्रीका को यह कच्चे माल के निर्यात से ऊपर उठकर एक औद्योगिक शक्ति बनने में मदद करेगी। यदि भारत और अफ्रीका मिलकर 'ड्रैगन' और 'हाथी' की तरह तालमेल से काम करें, तो वे न केवल अपने-अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे, बल्कि एक अधिक संतुलित और न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का निर्माण भी कर सकते हैं।