अमेरिकी टैरिफ विवाद और मीडिया की चुप्पी : एक समग्र विश्लेषण

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

अमेरिकी टैरिफ विवाद और मीडिया की चुप्पी : एक समग्र विश्लेषण

भारत–अमेरिका संबंध इन दिनों एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहे हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर सार्वजनिक मंच से कहते हैं—“अमेरिका से कुट्टी नहीं हुई है, वार्ता जारी है।” (नवोदय टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस)। वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी आदेशों के दबाव में भारतीय डाक विभाग ने अमेरिका को पार्सल भेजने की सेवा अस्थायी रूप से निलंबित कर दी है (द हिन्दू, देशबन्धु)। सवाल उठता है कि जब विदेश मंत्री दावा कर रहे हैं कि वार्ता चल रही है और रिश्ते बने हुए हैं, तो फिर जनता की रोज़मर्रा की सुविधा क्यों प्रभावित हो रही है?

 अमेरिकी आदेश और भारतीय डाक विभाग का फैसला

30 जुलाई 2025 को अमेरिका ने एक आदेश जारी कर 800 डॉलर तक के सामान पर मिलने वाली शुल्क-मुक्त छूट समाप्त कर दी। अब केवल 100 डॉलर तक के ‘गिफ्ट’ ही टैक्स फ्री रहेंगे। बाक़ी सभी पार्सल पर सीमा शुल्क लगेगा और उसकी प्री-पेड व्यवस्था अनिवार्य होगी। चूँकि भारतीय डाक विभाग ऐसी तकनीकी व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बिना काम नहीं कर सकता, उसने 25 अगस्त से अमेरिका के लिए पार्सल बुकिंग रोक दी। यह कदम सीधे-सीधे अमेरिकी दबाव और भारतीय प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करता है।


इंडियन एक्सप्रेस ने जयशंकर के बयान को अपनी लीड खबर बनाया—उन्होंने कहा कि अमेरिका का टैरिफ "अनुचित और गैरवाजिब" है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत किसानों और छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा करेगा। परंतु वास्तविकता यह है कि अमेरिकी कार्रवाई का सीधा असर भारतीय डाक सेवाओं और छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है। ऐसे में यह तर्कसंगत प्रश्न है कि बातचीत जारी है, लेकिन परिणाम कहाँ हैं?

 मीडिया कवरेज : टैरिफ बड़ा, डाक विभाग छोटा?

दिलचस्प यह है कि अधिकांश बड़े अखबारों ने जयशंकर का बयान प्रमुखता से छापा, लेकिन डाक विभाग द्वारा सेवा निलंबित करने जैसी महत्वपूर्ण खबर को कोनों में दबा दिया। जबकि यह सीधे आम जनता, एनआरआई परिवारों और छोटे निर्यातकों को प्रभावित करने वाला फैसला है। यही मीडिया का "चयनात्मक मौन" है—जहाँ सत्ता के अनुकूल बातों को प्रमुखता मिलती है और असुविधाजनक वास्तविकताओं को किनारे कर दिया जाता है।

झुनझुनवाला केस : बड़ी खबर क्यों नहीं?

इसी मीडिया की चयनात्मकता का दूसरा उदाहरण है रेखा झुनझुनवाला द्वारा नजारा टेक्नोलॉजीज़ के शेयर समय रहते बेच देना। 13 जून 2025 को उन्होंने 14 लाख से अधिक शेयर बेचे और दो महीने बाद सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध वाला विधेयक पेश किया। नतीजतन नजारा टेक का शेयर 17% गिरा। इस ‘संयोग’ ने उनके लगभग ₹334 करोड़ बचा लिए।

प्रश्न यह नहीं है कि यह इनसाइडर ट्रेडिंग था या नहीं—जांच एजेंसियाँ तय करेंगी। प्रश्न यह है कि इतने बड़े आर्थिक प्रभाव वाली घटना पर मीडिया का वह शोर क्यों नहीं है, जो वह अनिल अंबानी या अन्य पर कार्रवाई के समय करता रहा है? यह "खबर" भी पहले पन्नों से गायब है।

गौरतलब है कि रेखा झुनझुनवाला का नाम पहले भी ऐपटेक लिमिटेड इनसाइडर ट्रेडिंग मामले में आ चुका है, जहाँ उन्होंने सेबी के साथ सेटलमेंट किया था। तब यह खबर प्रमुख बनी थी। आज क्यों नहीं? यही मीडिया के "दोहरे मापदंड" को उजागर करता है।

 अमेरिका में राजदूत और भारत की मजबूरी

एक और खबर—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने करीबी सर्जियो गोर को भारत का राजदूत नियुक्त किया है। चूँकि ट्रम्प के भारत में व्यावसायिक हित हैं, इसलिए इस नियुक्ति का खास महत्व है। सवाल यह है कि भारत अपने वाणिज्यिक हितों की रक्षा कर पाने की स्थिति में है या नहीं? जयशंकर भले कहें कि ‘कुट्टी नहीं हुई’, लेकिन डाक विभाग का कदम और अमेरिकी नीति स्पष्ट कर देती है कि दबाव भारत पर ही है।

धर्मस्थल मामला और मीडिया की भूमिका

कर्नाटक में धर्मस्थल मंञ्चुना स्वामी मंदिर प्रकरण भी मीडिया के चयनात्मक रवैये का एक और उदाहरण है। पहले शिकायतकर्ता को व्हिसलब्लोअर बताया गया, अब उसे झूठी गवाही पर गिरफ्तार कर लिया गया। भाजपा इसे "सनातन धर्म को बदनाम करने की साजिश" बता रही है और एनआईए जांच की मांग कर रही है। परंतु मूल सवाल—न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ितों के अधिकार—खो जाते हैं। मीडिया राजनीतिक बयानबाज़ी पर केंद्रित रहता है, न कि सच्चाई की तह तक जाने पर।

मीडिया की प्राथमिकताएँ और लोकतंत्र की सेहत

विदेश नीति हो या आर्थिक घोटाले, निवेशकों की चाल हो या धार्मिक विवाद—भारतीय मीडिया की प्राथमिकताएँ सत्ता और बाज़ार के बीच झूलती रहती हैं। विदेश मंत्री की "वार्ता जारी है" वाली पंक्ति तो लीड बनती है, पर जनता को प्रभावित करने वाला डाक विभाग का निर्णय कोना पकड़ लेता है। बड़े निवेशक के करोड़ों बचाने का ‘संयोग’ खबर नहीं बनता, लेकिन किसी उद्योगपति पर सरकारी कार्रवाई ब्रेकिंग न्यूज़ हो जाती है।

पत्रकारिता का मूल धर्म है—जनपक्षधरता और सत्तापक्ष से सवाल। पर आज वह अक्सर "सत्तापक्ष की सुविधा" और "बाज़ार की चुप्पी" का औजार बन चुकी है।