“वोट का अधिकार बनाम सत्ता की हेडलाइन मैनेजमेंट”।

 संवाददाता: प्रदीप शुक्ला 


“वोट का अधिकार बनाम सत्ता की हेडलाइन मैनेजमेंट”

भारत के लोकतंत्र की आत्मा मतदाता की स्वतंत्रता और चुनाव की पारदर्शिता में बसती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि यह आत्मा दबाव और अविश्वास के घेरे में है। बिहार से शुरू हुई राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की “वोट अधिकार यात्रा” इस संकट का सशक्त प्रतीक बनकर उभर रही है। वहीं, चुनाव आयोग का असामान्य रूप से प्रेस विज्ञप्ति और प्रेस कांफ्रेंस करना अपने आप में ऐतिहासिक है – क्योंकि यह चुनाव की तारीख की घोषणा नहीं, बल्कि सफाई देने के लिए बुलाया गया है। सवाल यह है कि आखिर आयोग को ऐसी स्थिति में क्यों आना पड़ा?

दरअसल, जिस आरोप पर राहुल गांधी को नोटिस दिया गया, उसी तरह का आरोप भाजपा नेताओं की ओर से बार-बार लगाया जाता रहा है। पर वहाँ चुनाव आयोग की कठोरता गायब रही। यही दोहरा रवैया अविश्वास को जन्म देता है। आयोग का कहना है कि राजनीतिक दलों और उनके एजेंटों ने समय रहते मतदाता सूची की जाँच नहीं की, पर बिहार की एसआईआर प्रक्रिया और उसमें उभरी विसंगतियाँ यह साबित करती हैं कि समस्या जड़ में है। मतदाता सूची में फर्जी नाम हों, एक ही नाम कई बार दर्ज हों या वैध नाम छूट जाएँ – इसकी जिम्मेदारी केवल मतदाता या दलों पर डालकर आयोग अपना पल्ला झाड़ ले, यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

और भी गंभीर है मीडिया का रवैया। देश के प्रमुख अखबारों ने आयोग की इस प्रेस कांफ्रेंस और विज्ञप्ति को वह महत्व नहीं दिया, जो लोकतंत्र के भविष्य से जुड़ी खबर को मिलना चाहिए था। इसके उलट, अंतरराष्ट्रीय मामलों या सरकार समर्थक खबरों को प्रमुखता दी गई। यह वही “हेडलाइन मैनेजमेंट” है, जिसे विपक्षी दल लगातार रेखांकित करते आ रहे हैं। अगर मीडिया ही सत्ता की सुविधा अनुसार खबरों का वजन तय करेगा, तो आम जनता तक सच्चाई कैसे पहुँचेगी?

सुप्रीम कोर्ट में आयोग की स्वतंत्रता पर सुनवाई लंबित है, आयोग प्रमुख की नियुक्ति को लेकर विवाद है, और बिहार जैसे राज्यों में मतदाता सूची के हालात जनता का भरोसा तोड़ रहे हैं। ऐसे में आयोग का यह कहना कि “हम नियमानुसार काम कर रहे हैं” पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र केवल नियमों से नहीं चलता, बल्कि उन पर जनता के विश्वास से खड़ा रहता है।

आज सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग वास्तव में स्वायत्त संस्था की तरह काम कर रहा है, या फिर वह भी सत्ता की हेडलाइन रणनीति का हिस्सा बन चुका है? मतदाता सूची में त्रुटियाँ सिर्फ कागज़ी भूल नहीं हैं, बल्कि यह लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करती हैं। यदि जनता का भरोसा ही टूट गया, तो मतपेटी का महत्व खो जाएगा।

इसलिए यह ज़रूरी है कि अखबार सत्ता के प्रचार तंत्र से ऊपर उठकर अपनी असली भूमिका निभाएँ और आयोग यह समझे कि उसका काम केवल “प्रक्रियाएँ निभाना” नहीं, बल्कि लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को अक्षुण्ण बनाए रखना है। अन्यथा, वोट चोरी का आरोप सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की दुखद सच्चाई बन जाएगा।