“द ग्रेट बिहार पॉलिटिक्स” : 1995-2005 का निर्णायक दशक
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
द ग्रेट बिहार पॉलिटिक्स” : 1995-2005 का निर्णायक दशकभारतीय राजनीति में बिहार सदैव एक प्रयोगशाला रहा है। यदि कहा जाए कि बिहार की असली राजनीति 1995 से 2005 के बीच अपने उत्कर्ष और पतन दोनों को जी चुकी, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह कालखंड न केवल जाति-आधारित सामाजिक न्याय की राजनीति का चरम था बल्कि सत्ता-संघर्ष, संस्थागत टकराव और नए नेतृत्व के उदय का दौर भी।
# लालू प्रसाद और मंडल राजनीति
लालू प्रसाद का वास्तविक राजनीतिक लाभ उन्हें मंडल कमीशन लागू होने से मिला। 1990-95 का समय वह दौर था जब लालू “हुक एंड क्रूक” राजनीति के प्रतिनिधि बनकर उभरे। भागलपुर दंगे की पृष्ठभूमि में, कांग्रेस की टूटफूट और अस्थिरता ने उनके लिए मार्ग प्रशस्त किया। भाजपा के शुरुआती सहयोग ने भी इस उदय को बल दिया।
# टकराव और पूर्ण बहुमत
1995 आते-आते लालू प्रसाद पूर्ण बहुमत की सरकार लेकर लौटे। यह वही समय था जब टी.एन. शेषन जैसे कठोर चुनाव आयुक्त ने सोशलिस्ट राजनीति पर शिकंजा कसने की कोशिश की। परंतु लालू ने न केवल बहुमत कायम रखा, बल्कि लोकसभा में भी प्रभाव जमाया। मुस्लिम मतदाताओं को उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोककर स्थायी आधार पर जोड़ा, जो कांग्रेस या कर्पूरी ठाकुर भी नहीं कर पाए थे।
# नैरेटिव और पॉलिटिकल किलिंग
जैसे ही लालू प्रसाद ने मजबूत सत्ता-आधार खड़ा किया, वैसे ही उनके खिलाफ “पॉलिटिकल किलिंग” का दौर शुरू हुआ। न्यायपालिका, मीडिया और नौकरशाही के गलियारों से लेकर माफिया नेटवर्क तक, हर ओर से उनके खिलाफ नैरेटिव गढ़े गए। आरोपों और घोटालों ने उनकी छवि को तोड़ा। 1997 के बाद जेल की सजा ने उनके राजनीतिक ग्राफ को निर्णायक रूप से गिरा दिया।
# नीतीश कुमार का उभार
इसी दौर में नीतीश कुमार एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में उभरते हैं। समाज की कम आबादी वाले, किन्तु संगठित वर्ग से आने वाले नीतीश को एक ‘सुरक्षित निवेश’ समझा गया। उनका सबसे बड़ा प्रयोग था सोशल इंजीनियरिंग और महिला वोट बैंक का निर्माण। 2005-2010 के बीच उनकी योजनाओं ने महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाया, जिससे लालू के गढ़ में भी सेंध लगी।
# विभाजन और राजनीतिक संतुलन
2000 में बिहार के विभाजन ने लालू की शक्ति को कमजोर किया। इसके बाद यूपीए और एनडीए की केंद्रीय राजनीति ने बिहार के नेतृत्व समीकरणों को तय करना शुरू किया। राष्ट्रपति शासन और पुनः चुनावों के बीच नीतीश को राजनीतिक अवसर मिला और वे 2005 में निर्णायक तौर पर सत्ता में स्थापित हुए।
1995-2005 का कालखंड बिहार की राजनीति का “क्लासरूम” है। यहाँ से तीन सबक स्पष्ट मिलते हैं—
1. जाति आधारित राजनीति स्थायी आधार तो देती है, पर संस्थागत टकराव उसे अस्थिर कर सकता है।
2. नैरेटिव और मीडिया राजनीति का वैकल्पिक युद्धक्षेत्र बन जाते हैं।
3. सामाजिक इंजीनियरिंग और महिला सशक्तिकरण जैसे नए प्रयोग राजनीति को नई दिशा देते हैं।
बिहार की राजनीति का यह दशक दरअसल भारतीय लोकतंत्र के जटिल समीकरणों का आइना है—जहाँ एक ओर लालू प्रसाद की करिश्माई शैली ने सत्ता को चुनौतीपूर्ण बनाया, वहीं नीतीश कुमार की रणनीतिक चुप्पी और सामाजिक इंजीनियरिंग ने उसे स्थायित्व प्रदान किया।