सफ़र को अब और बेहतर, ख़ुद को कारगर बनाना है, झुकना नहीं ज़ालिम के आगे, बस आगे बढ़ते जाना
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सफ़र को अब और बेहतर, ख़ुद को कारगर बनाना है,
झुकना नहीं ज़ालिम के आगे, बस आगे बढ़ते जाना है!
शहर का अंधा जूनूँ न सोखे, देहात की ठंडी छाँव मेरी,
दिल की दहलीज़ पे लाके दफ़्तर, महलों का गुमाँ गिराना है!
कट जाए भले ये सर मेरा, पर पैर न बाहर निकलेंगे,
ज़रूरतों की ही चादर में, महलों को धूल चटाना है!
काँच और पत्थरों के ये मकां, इंसानों का ख़ून पीते हैं,
तोड़ कंक्रीट के इन जालों को, मिट्टी का तख़्त बनाना है!
न ऊँचा हो कोई मसनद यहाँ, न कोई ज़ेर-ए-दस्त रहे,
बराबरी का परचम थामे, हर आँख को एक-बराबर बनाना है!
उठो ओ देश के दीवानों! अब इंकलाब की बारी है,
लड़कर लेंगें हम अपना हक़, यह नया संसार बनाना है!
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