गिरती रैंकिंग, डगमगाता विश्वास : क्या भारतीय अर्थव्यवस्था किसी गहरे मोड़ पर खड़ी है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
गिरती रैंकिंग, डगमगाता विश्वास : क्या भारतीय अर्थव्यवस्था किसी गहरे मोड़ पर खड़ी है?
वैश्विक युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं के टूटते संतुलन और महाशक्तियों के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। लेकिन इन वैश्विक झटकों के बीच एक प्रश्न भारत में अधिक तीव्रता से उभर रहा है — आखिर क्यों भारतीय कंपनियों की वैश्विक रैंकिंग इतनी तेज़ी से नीचे खिसकती दिखाई दे रही है, जबकि अमेरिका और चीन की बड़ी कंपनियाँ अब भी अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं?
Reliance Industries, HDFC Bank, Bharti Airtel, Adani Enterprises, Larsen & Toubro, Bajaj Finance जैसी निजी कंपनियों से लेकर State Bank of India और Life Insurance Corporation of India जैसी सार्वजनिक संस्थाएँ भी बाज़ार मूल्यांकन और वैश्विक निवेशक विश्वास के पैमानों पर नीचे खिसकती दिखाई दे रही हैं। यह केवल कॉरपोरेट जगत का संकट नहीं; यह उस आर्थिक आत्मविश्वास पर प्रश्नचिह्न है जिसे पिछले एक दशक में “उभरते भारत” की सबसे बड़ी कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह सच है कि शेयर बाज़ार किसी राष्ट्र की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का अंतिम दर्पण नहीं होता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बाज़ार निवेशकों के मनोविज्ञान, भविष्य की संभावनाओं और आर्थिक दिशा का संवेदनशील संकेतक अवश्य होता है। जब बड़ी कंपनियों का बाज़ार मूल्य गिरता है, तो उसके पीछे केवल तकनीकी कारण नहीं होते; उसके पीछे पूँजी का भय, निवेशकों की आशंका और भविष्य को लेकर असुरक्षा भी छिपी होती है।
आज अमेरिका की तकनीकी कंपनियाँ वैश्विक पूँजी का सबसे सुरक्षित ठिकाना बनी हुई हैं। Apple, Microsoft और NVIDIA जैसी कंपनियाँ केवल कॉरपोरेट संस्थाएँ नहीं, बल्कि वैश्विक डिजिटल व्यवस्था की धुरी हैं। दूसरी ओर चीन, अपने केंद्रीकृत राज्य-नियंत्रित आर्थिक मॉडल के माध्यम से, अपनी रणनीतिक कंपनियों को भू-राजनीतिक संरक्षण प्रदान करता है।
भारत की स्थिति इन दोनों के बीच कहीं अस्थिर दिखाई देती है। यहाँ आर्थिक उदारीकरण तो हुआ, लेकिन औद्योगिक आत्मनिर्भरता उस गति से विकसित नहीं हो सकी; डिजिटल विस्तार हुआ, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र पर्याप्त मजबूत नहीं बन पाया; बाज़ार बढ़ा, लेकिन व्यापक जनता की क्रयशक्ति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी।
यही वह अंतर्विरोध है जो आज भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने खड़ा है।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय शेयर बाज़ार में अभूतपूर्व उछाल देखा गया। लेकिन यह उछाल किस हद तक वास्तविक आर्थिक विस्तार पर आधारित था और किस हद तक विदेशी पूँजी, सट्टा निवेश तथा प्रचार आधारित आशावाद पर — यह प्रश्न अब अधिक गंभीर हो उठा है। विदेशी संस्थागत निवेशक संकट के समय सबसे पहले उभरते बाजारों से पूँजी निकालते हैं। भारत भी इस वैश्विक पूँजी प्रवाह का अपवाद नहीं है।
ऊर्जा आयात पर निर्भरता, वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि, युद्धजनित अस्थिरता, घरेलू मांग की सीमाएँ और बढ़ती आर्थिक विषमता भारतीय बाजार को अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील बनाती हैं। ऐसे में कंपनियों की गिरती रैंकिंग केवल “कॉरपोरेट समस्या” नहीं रहती; वह आर्थिक संरचना की कमजोरी का संकेत बन जाती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत का विकास मॉडल वास्तविक उत्पादन और रोजगार पर आधारित है, या केवल वित्तीय सूचकांकों और प्रचारित विकास-कथाओं पर?
यदि अर्थव्यवस्था का लाभ सीमित कॉरपोरेट समूहों तक केंद्रित होता जाएगा, जबकि आम जनता महंगाई, बेरोजगारी और आय असमानता से जूझती रहेगी, तो आर्थिक विकास का आधार धीरे-धीरे खोखला होने लगेगा। किसी भी राष्ट्र की स्थायी आर्थिक शक्ति केवल अरबपतियों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की क्रयशक्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से निर्मित होती है।
यहाँ सरकार और विशेष रूप से वित्त मंत्रालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में आर्थिक प्रश्नों पर पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है। यदि बड़े पैमाने पर बाज़ार पूँजीकरण घट रहा है, निवेशकों का विश्वास कमजोर पड़ रहा है और वैश्विक मंचों पर भारतीय कंपनियों की स्थिति प्रभावित हो रही है, तो सरकार का दायित्व केवल आश्वस्त करने वाले भाषण देना नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है।
यह समय आत्ममुग्ध उत्सव का नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का है।
भारत आज विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला राष्ट्र है। उसके पास विशाल बाजार, तकनीकी प्रतिभा और लोकतांत्रिक ऊर्जा है। लेकिन यदि यही राष्ट्र रोजगारविहीन विकास, बढ़ती असमानता और कमजोर औद्योगिक आधार की दिशा में बढ़ता रहा, तो आर्थिक शक्ति का सपना अधूरा रह सकता है।
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि किसी कंपनी की रैंकिंग कितनी ऊपर या नीचे गई। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह वैश्विक संकटों के बीच भी अपने नागरिकों को स्थिरता, अवसर और सुरक्षा प्रदान कर सके?
क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र की शक्ति उसके शेयर बाज़ार की ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसके समाज की स्थिरता और जनता के विश्वास से मापी जाती है। और यदि जनता के भीतर यह प्रश्न उठने लगे कि “क्या देश किसी गहरे आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है?”, तो यह केवल आर्थिक चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की गंभीर चेतावनी है।
