ऑनलाइन प्रेम-प्रसंगों के कारण “लाइन मारने” की प्राचीन भारतीय कला का पतन

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


ऑनलाइन प्रेम-प्रसंगों के कारण “लाइन मारने” की प्राचीन भारतीय कला का पतन

# — एक विलुप्त होती लोक-संस्कृति का करुण आख्यान

भारत सदैव से केवल वेदों, उपनिषदों, मंदिरों और महाकाव्यों का देश ही नहीं रहा, बल्कि वह उन सूक्ष्म मानवीय कलाओं का भी देश रहा है, जो इतिहास के ग्रंथों में भले न लिखी गई हों, किंतु जनजीवन की स्मृतियों में सदैव जीवित रहीं। यहाँ ऋषियों ने तप किया, कवियों ने प्रेम गाया, और युवाओं ने गलियों, छतों तथा चौराहों के बीच एक अद्भुत लोककला को जन्म दिया — “लाइन मारना”।


यह कोई साधारण क्रिया नहीं थी। यह भारतीय युवावस्था का मौन नाट्य था। इसमें शब्द कम, संकेत अधिक होते थे; साहस कम, धड़कनें अधिक होती थीं। यह कला किसी विद्यालय में नहीं सिखाई जाती थी, किंतु हर मोहल्ले, हर कस्बे और हर महाविद्यालय के वातावरण में स्वतः विकसित हो जाती थी।


उस समय प्रेम डिजिटल नहीं था; वह धूप की तरह धीरे-धीरे उतरता था। किसी के घर के सामने से अनावश्यक रूप से गुजरना, साइकिल की चेन को जानबूझकर उतार लेना, पान की दुकान पर बिना कारण खड़े रहना, या स्कूल से लौटने का मार्ग केवल इसलिए बदल देना कि शायद एक झलक मिल जाए — ये सब उसी महान कला के प्रारंभिक अध्याय थे।


उन दिनों आँखें पत्रों का कार्य करती थीं और मौन संवादों का। एक क्षण की मुस्कान कई महीनों तक हृदय को आलोकित रख सकती थी। छतों पर सूखते कपड़े भी कभी-कभी प्रेम के गुप्त संकेत बन जाते थे। खिड़कियों की हल्की आहटों में अर्थ छिपे रहते थे। मोहल्ले का हर मोड़ मानो किसी अधूरे गीत की पंक्ति हो।


मित्रों की भूमिका भी उस युग में अत्यंत पवित्र हुआ करती थी। वे केवल मित्र नहीं, बल्कि दूत, रणनीतिकार, कवि, प्रहरी और कभी-कभी बलिदानी सैनिक भी होते थे। कोई मित्र विद्यालय की कॉपी में पत्र छिपाकर पहुँचाता था, तो कोई गली के बाहर पहरा देता था। प्रेम उस समय निजी भावना कम और सामूहिक अभियान अधिक प्रतीत होता था।


और वे प्रेम-पत्र!


आह… वे प्रेम-पत्र केवल शब्द नहीं होते थे, वे किसी किशोर हृदय की काँपती हुई आत्मा होते थे। कापियों के अंतिम पृष्ठों पर लिखी गई टेढ़ी-मेढ़ी पंक्तियों में जितनी सच्चाई होती थी, उतनी आज हजारों इमोजियों में भी नहीं मिलती। उन पत्रों में व्याकरण की त्रुटियाँ अवश्य होती थीं, पर भावनाओं की नहीं।


फिर समय बदला।


विज्ञान ने मनुष्य को गति दी। मोबाइल आए, इंटरनेट आया, सोशल मीडिया आया, और देखते ही देखते प्रेम गलियों से निकलकर स्क्रीन में कैद हो गया। अब न प्रतीक्षा रही, न धड़कनों का वह धीमा संगीत। “हाय”, “हेलो”, “टाइपिंग…”, “सीन” और “लास्ट सीन” ने प्रेम के समस्त रहस्य को कुछ सेकंडों में समेट दिया।


जहाँ कभी किसी के दर्शन के लिए युवक दो घंटे तक चौराहे पर धूप सह लेता था, वहाँ अब एक प्रोफाइल फोटो देखकर संबंध आरंभ हो जाते हैं और एक “ब्लॉक” पर समाप्त। प्रेम अब तपस्या नहीं, सूचना-प्रौद्योगिकी का त्वरित लेन-देन बनता जा रहा है।


मोहल्लों के वे चौराहे, जहाँ कभी युवाओं के समूह अनायास मंडराते रहते थे, अब सूने हैं। पान की दुकानों की प्रतीक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं। छतों पर अब आँखें कम और मोबाइल स्क्रीन अधिक दिखाई देती हैं। मित्रों की भूमिका भी सिकुड़ गई है; अब वे केवल इतना कहते हैं — “भाई, उसकी डीपी भेज।”


सबसे अधिक आघात साहित्य को पहुँचा है। प्रेम-पत्रों की जगह कॉपी-पेस्ट शायरियों ने ले ली है। अब भावनाएँ भी “फॉरवर्डेड” हो गई हैं। मौलिकता का वह निष्कपट कंपन, जो कभी काँपते हाथों से लिखे गए पत्रों में मिलता था, अब डिजिटल अक्षरों की चमक में खो गया है।


निस्संदेह, आधुनिकता ने जीवन को सरल बनाया है। संवाद की दूरियाँ घटी हैं। भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज हुई है। परंतु हर सुविधा अपने साथ कुछ अमूल्य चीजें भी ले जाती है। ऑनलाइन प्रेम ने मनुष्य को त्वरित संवाद तो दिया, किंतु प्रतीक्षा का सौंदर्य छीन लिया; संपर्क दिया, किंतु वह संकोच नहीं, जिसमें प्रेम की आत्मा बसती थी।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस विलुप्त होती लोककला को केवल हास्य का विषय न मानें। “लाइन मारना” भारतीय सामाजिक जीवन का एक जीवंत सांस्कृतिक अध्याय था। उसमें धैर्य था, विनोद था, असफलता का साहस था, और सबसे बढ़कर — मानवीय स्पर्श था।


अन्यथा आने वाली पीढ़ियाँ शायद यह कभी समझ ही न पाएँ कि एक समय ऐसा भी था, जब प्रेम “ऑनलाइन” नहीं होता था; वह गलियों में टहलता था, छतों पर प्रतीक्षा करता था, खिड़कियों से झाँकता था, और एक मुस्कान के सहारे महीनों जीवित रह सकता था। और तब इतिहास के किसी धूल भरे पन्ने पर कोई उदास इतिहासकार लिखेगा — “भारतवर्ष में कभी ‘लाइन मारना’ नामक एक अद्भुत लोककला प्रचलित थी। इसका अंत मोबाइल डेटा, मुफ्त WiFi और अनलिमिटेड इंटरनेट पैक के प्रसार के साथ हो गया।”