'विश्वगुरु' की चमक और हाशिये का अंधेरा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'विश्वगुरु' की चमक और हाशिये का अंधेरा
### भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता का डेटा-आधारित एक्स-रे
आज का भारत दो विरोधाभासी समानांतर सत्यों के बीच जी रहा है। एक तरफ भारत वैश्विक जीडीपी (GDP) विकास दर में अग्रणी भूमिका निभा रहा है, शेयर बाज़ार रिकॉर्ड स्तर छू रहे हैं, और देश में अरबपतियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ, देश की आधी से अधिक आबादी बुनियादी जीवन स्तर और सम्मानजनक आय के लिए संघर्ष कर रही है। वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की 'वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट' और ऑक्सफैम की रिपोर्टें इस असंतुलन को ठोस सांख्यिकीय प्रमाणों के साथ रेखांकित करती हैं।
१. राष्ट्रीय आय और संपत्ति का चरम संकेंद्रण (Concentration of Income & Wealth)
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब (WIL) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में आय और संपत्ति का वितरण वर्तमान में अपने ऐतिहासिक रूप से सबसे असमान दौर में पहुंच गया है।
* शीर्ष १% का एकाधिकार: देश की मात्र १% सबसे अमीर आबादी के पास भारत की कुल राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग ४०% हिस्सा है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि विकास का सबसे बड़ा लाभांश केवल मुट्ठी भर लोगों तक सीमित हो गया है।
* शीर्ष १०% बनाम निचली ५०% आबादी:
* आय (Income Share): भारत की कुल राष्ट्रीय आय का ५८% हिस्सा केवल शीर्ष १०% कमाने वालों की जेब में जाता है। इसके विपरीत, देश की निचली ५०% आबादी के हिस्से में राष्ट्रीय आय का मात्र १५% आता है।
* संपत्ति (Wealth Share): यदि अचल संपत्ति, सोने और वित्तीय निवेश सहित कुल संचित संपत्ति की बात करें, तो शीर्ष १०% अमीर वर्ग देश की ६५% संपत्ति का मालिक है।
* ऐतिहासिक पतन: रिपोर्ट का एक सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि १९८० में भारत की एक बड़ी आबादी वैश्विक 'मध्यम ४०%' (Middle 40%) श्रेणी में शामिल थी, लेकिन बदलते आर्थिक ढांचे के कारण अब भारत की वह आबादी खिसककर वैश्विक 'निचली ५०%' आबादी के स्तर पर आ गई है।
२. राजकोषीय नीतियां और टैक्स का असमान बोझ (Regressive Taxation)
ऑक्सफैम की 'टैकर्स नॉट मेकर्स' (Takers Not Makers) और 'कमिटमेंट टू रिड्यूसिंग इनइक्वालिटी इंडेक्स' जैसी रिपोर्टों ने भारत के कर ढांचे (Tax Structure) पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह डेटा गार्गी के उस कथन को पूरी तरह चरितार्थ करता है जहाँ वे व्यवस्था द्वारा श्रमिकों के शोषण की बात करती हैं।
* जीएसटी (GST) का बोझ: ऑक्सफैम के आंकड़ों के अनुसार, देश में एकत्र होने वाले कुल वस्तु एवं सेवा कर (GST) का लगभग ६४% हिस्सा समाज की निचली ५०% आबादी से आता है। इसके विपरीत, शीर्ष १०% अमीर वर्ग कुल जीएसटी में मात्र ४% का योगदान देता है। चूंकि अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) अमीर और गरीब दोनों पर समान दर से लगता है, इसलिए अपनी कम आय के कारण गरीब आबादी अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा टैक्स में दे देती है।
* कॉरपोरेट टैक्स में छूट: प्रत्यक्ष करों (जैसे कॉरपोरेट टैक्स और वेल्थ टैक्स) में लगातार की गई कटौतियों और रियायतों ने अमीर वर्ग की पूंजी को तेज़ी से बढ़ाने में मदद की है, जबकि सामाजिक सुरक्षा नेट (Social Security Net) के लिए सरकारी बजट में अनुपातिक रूप से कमी देखी गई है।
३. लैंगिक असमानता और अदृश्य श्रम (The Gender and Care Gap)
असमानता केवल रुपयों के लेन-देन में नहीं है, बल्कि यह लैंगिक स्तर पर भी बहुत गहरी है। वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब और ऑक्सफैम दोनों ने भारत में महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर गंभीर डेटा प्रस्तुत किया है:
* श्रम बल में बेहद कम भागीदारी: भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (Female Labor Force Participation) वैश्विक स्तर पर सबसे निचले स्तरों में से एक—मात्र १५.७% पर रुकी हुई है।
* बिना भुगतान का काम (Unpaid Care Work): अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और ऑक्सफैम के समन्वित आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ हर दिन औसतन २९७ मिनट बिना भुगतान वाले घरेलू और देखभाल के कार्यों में लगाती हैं (जैसे चूल्हा फूंकना, पानी लाना, बच्चों की देखरेख), जबकि पुरुष इस काम में औसतन केवल ३१ मिनट बिताते हैं। यह 'अदृश्य श्रम' महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने से रोकता है।
४. मानव पूंजी और अवसरों की असमानता (Education and Health Divide)
यह कहना कि "संसार वैसा नहीं है जैसा उसे बताया गया है... कुछ लोग पूरी आयु भूमि पर बैठे रह जाते हैं," आज के शैक्षणिक और स्वास्थ्य विभाजन को बयां करता है।
* डिजिटल और बुनियादी विभाजन: 'असर' (ASER) और यूडीआईएसई+ (UDISE+) की रिपोर्टों के अनुसार, माध्यमिक स्तर (Secondary Level) तक आते-आते गरीब और हाशिये के समुदायों (SC, ST और अल्पसंख्यक) का स्कूल ड्राप-आउट रेट १२.६% तक पहुंच जाता है।
* स्वास्थ्य पर जेब से खर्च (Out-of-Pocket Expenditure): भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के कारण आज भी आम नागरिकों को अपनी जेब से स्वास्थ्य पर अत्यधिक खर्च करना पड़ता है, जो हर साल लाखों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल देता है।
५. नया आयाम: जलवायु असमानता (Climate Inequality)
वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में असमानता का एक नया और डरावना आयाम जोड़ा है, जिसे 'क्लाइमेट इनइक्वालिटी' (Climate Inequality) कहा गया है:
* कार्बन उत्सर्जन में अमीरों की हिस्सेदारी: निजी पूंजी और विलासितापूर्ण जीवनशैली से जुड़े कार्बन उत्सर्जन में शीर्ष १०% अमीर आबादी ७७% उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है।
* गरीबों पर मार: इसके विपरीत, देश की सबसे गरीब ५०% आबादी केवल ३% उत्सर्जन करती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन (बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी) की सबसे पहली और क्रूर मार इसी गरीब आबादी और किसानों पर पड़ती है, जिनके पास इससे निपटने के संसाधन नहीं हैं।
## निष्कर्ष और नीतिगत सुधार के उपाय
ये तथ्य और आंकड़े यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत की आर्थिक नीतियां वर्तमान में 'समावेशी विकास' (Inclusive Growth) के सिद्धांत से भटक चुकी हैं। ऑक्सफैम और वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब ने इस खाई को पाटने के लिए निम्नलिखित तात्कालिक सुझाव दिए हैं:
1. प्रगतिशील कराधान (Progressive Taxation): देश के अति-अमीर वर्ग (Billionaires) पर 'वेल्थ टैक्स' (Wealth Tax) और 'इनहेरिटेंस टैक्स' (उत्तराधिकार कर) को दोबारा लागू किया जाए, ताकि सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सके।
2. सार्वजनिक निवेश में वृद्धि: टैक्स से प्राप्त इस राजस्व का उपयोग मुफ्त और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा (Universal Healthcare) और पोषण योजनाओं पर किया जाए।
3. न्यूनतम मजदूरी और श्रमिक अधिकार: अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) में काम करने वाले करोड़ों गिग वर्कर्स, निर्माण श्रमिकों और कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम सम्मानजनक मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
यदि समय रहते इन नीतिगत खामियों को सुधारा नहीं गया, तो वह अंतिम प्रश्न व्यवस्था को हमेशा कटघरे में खड़ा रखेगा कि—"यह संसार ऐसा क्यों है जैसा है… और इसे ऐसा ही क्यों रहने दिया जाए?"
