प्रश्नों से घबराता लोकतंत्र : मीडिया, सत्ता और मौन का भारतीय संकट
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
प्रश्नों से घबराता लोकतंत्र : मीडिया, सत्ता और मौन का भारतीय संकट
हाल ही में एक विदेशी पत्रकार द्वारा भारत के प्रधानमंत्री से यह पूछना कि “आप सवालों के जवाब क्यों नहीं देते?” — केवल एक औचक संवाद नहीं था। वह दृश्य समकालीन भारतीय लोकतंत्र, राजनीतिक संचार और मीडिया की स्वतंत्रता पर उठते वैश्विक प्रश्नों का प्रतीक बन गया।
इस घटना की व्याख्या अलग-अलग वैचारिक दृष्टिकोणों से की जा सकती है। समर्थक इसे प्रोटोकॉल और कूटनीतिक अनुशासन का विषय मान सकते हैं, जबकि आलोचक इसे सत्ता और संवाद के बीच बढ़ती दूरी का संकेत कह सकते हैं। किंतु इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह प्रश्न है, जो उस एक पत्रकार से कहीं बड़ा है — क्या भारत में सत्ता अब प्रश्नों को लोकतांत्रिक अनिवार्यता के बजाय असुविधा के रूप में देखने लगी है?
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह निरंतर सार्वजनिक जवाबदेही से संचालित होता है। संसद, न्यायपालिका, विपक्ष और मीडिया — ये सभी संस्थाएँ सत्ता से प्रश्न पूछने के लिए ही अस्तित्व में हैं। इसलिए जब किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र का सर्वोच्च निर्वाचित नेतृत्व नियमित प्रेस संवादों से दूर दिखाई देता है, तो प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता; वह लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रश्न बन जाता है।
विडंबना यह है कि इस पूरे विवाद में सबसे कम चर्चा उस बात पर हुई, जो वास्तव में भारत की सबसे बड़ी ताकत हो सकती थी — संवाद की शक्ति। यदि किसी तीखे या अप्रत्याशित प्रश्न का उत्तर सहजता, आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक विनम्रता से दिया जाता, तो संभव था कि वही क्षण भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत करता। क्योंकि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति आलोचना से बचने में नहीं, बल्कि आलोचना को सुनने की क्षमता में निहित होती है।
भारत स्वयं को “विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र” कहता है। यह केवल जनसंख्या का तथ्य नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। बड़े लोकतंत्र का अर्थ केवल अधिक मतदाता नहीं होता; उसका अर्थ अधिक सहिष्णुता, अधिक पारदर्शिता और अधिक सार्वजनिक संवाद भी होता है। यहीं से मीडिया की स्वतंत्रता का प्रश्न जुड़ता है।
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि भारत में मीडिया पूरी तरह समाप्त हो चुका है या हर पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता बन चुका है। भारत अब भी अनेक साहसी पत्रकारों, स्वतंत्र डिजिटल मंचों और जमीनी रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया कर्मियों का देश है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मुख्यधारा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पिछले वर्षों में सत्ता-केंद्रित विमर्श की ओर झुकता हुआ दिखाई दिया है।
समस्या केवल यह नहीं कि सरकार की उपलब्धियों को दिखाया जाता है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब विफलताओं पर व्यवस्थित मौन दिखाई देने लगे।
यदि शिक्षा व्यवस्था में पेपर लीक लगातार हो रहे हों, युवा आत्महत्या कर रहे हों, सरकारी अस्पतालों की स्थिति दयनीय हो, किसानों की आय और खेती की वास्तविकता सरकारी दावों से मेल न खाती हो, बेरोजगारी और महंगाई आम परिवारों को प्रभावित कर रही हो — और इन प्रश्नों पर गंभीर, निरंतर और कठोर पत्रकारिता दुर्लभ हो जाए — तब लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
स्वतंत्र मीडिया की पहचान यह नहीं कि वह केवल विपक्ष की आलोचना करे या केवल सरकार का गुणगान करे। उसकी पहचान यह है कि वह सत्ता के हर केंद्र से समान दूरी बनाए रखे। पत्रकारिता का धर्म विपक्ष का प्रवक्ता बनना भी नहीं है और सरकार का रक्षक बनना भी नहीं; उसका धर्म जनता के प्रश्नों को सत्ता तक पहुँचाना है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ भी है। भारत में मीडिया और सत्ता का संबंध कभी पूर्णतः आदर्श नहीं रहा। The Emergency भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है, जब प्रेस स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष हमला हुआ। बाद के दशकों में भी सरकारें मीडिया को प्रभावित करने का प्रयास करती रहीं। इसलिए यह मान लेना कि अतीत पूर्णतः स्वतंत्र था और वर्तमान पूर्णतः दमनकारी — इतिहास को सरल बना देना होगा।
लेकिन समकालीन समय की विशेषता यह है कि सत्ता और मीडिया के बीच वैचारिक निकटता, कॉरपोरेट नियंत्रण, टीआरपी आधारित उग्र बहसें और डिजिटल प्रचार-तंत्र ने पत्रकारिता की प्रकृति को गहराई से बदल दिया है। आज “न्यूज़” और “नैरेटिव” के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।
प्राइम टाइम बहसों में शोर अधिक है, तथ्य कम। राष्ट्रवाद का प्रदर्शन अधिक है, नीतिगत विश्लेषण कम। सत्ता से असहमत आवाज़ों को कई बार “राष्ट्र-विरोधी”, “एजेंडा-चालित” या “विकास विरोधी” कहकर खारिज कर दिया जाता है। दूसरी ओर, सरकार समर्थक विमर्श को कई चैनलों पर लगभग संस्थागत समर्थन मिलता दिखाई देता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं कही जा सकती।
हालाँकि यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है। मीडिया की वर्तमान स्थिति का सम्पूर्ण दोष केवल सरकार पर डालना पर्याप्त नहीं होगा। मीडिया स्वयं भी एक उद्योग बन चुका है, जो विज्ञापन, कॉरपोरेट हितों, राजनीतिक पहुँच और डिजिटल एल्गोरिद्म से संचालित होता है। दर्शक भी कई बार वही देखना पसंद करते हैं जो उनके पूर्वाग्रहों की पुष्टि करे। इसलिए संकट केवल सत्ता का नहीं, लोकतांत्रिक सार्वजनिक संस्कृति का भी है। फिर भी यह प्रश्न अपनी जगह बना रहता है — क्या भारत में सत्ता से कठोर प्रश्न पूछने की संस्थागत संस्कृति कमजोर हुई है?
यदि प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री या अन्य शक्तिशाली नेता खुली प्रेस कॉन्फ्रेंसों से दूर रहते हैं; यदि कठिन प्रश्नों की जगह पूर्वनिर्धारित संवाद अधिक दिखाई देते हैं; यदि आलोचनात्मक पत्रकारिता मुख्यधारा से धीरे-धीरे हाशिए पर चली जाती है — तो लोकतंत्र में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है। क्योंकि प्रश्न लोकतंत्र के शत्रु नहीं होते। प्रश्न लोकतंत्र के सुरक्षा कवच होते हैं।
कोई भी सरकार, चाहे वह किसी भी दल की हो, यदि आलोचना से असहज होने लगे, तो धीरे-धीरे उसके आसपास प्रशंसकों की दीवार खड़ी होने लगती है। और इतिहास गवाह है कि जब सत्ता केवल प्रशंसा सुनती है, तब वह वास्तविकता से कटने लगती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, बहस और असहमति की परंपरा रही है। यही वह भूमि है जहाँ बुद्ध ने प्रश्न किए, कबीर ने प्रश्न किए, गांधी ने प्रश्न किए और संविधान निर्माताओं ने सत्ता को सीमित करने के लिए संस्थाएँ निर्मित कीं। इसलिए यदि आज मीडिया, संवाद और प्रश्नों की स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय बहस हो रही है, तो उसे राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक चेतना के रूप में देखा जाना चाहिए।
अंततः किसी राष्ट्र की महानता इस बात से तय नहीं होती कि उसके नेता कितने शक्तिशाली हैं; बल्कि इससे तय होती है कि उसके नागरिक और पत्रकार सत्ता से कितने निर्भय होकर प्रश्न पूछ सकते हैं।
